सेवाधम : सेत्रामा्ग

लेखक श्रीकृष्णदत्त पालीवाल सादित्यरत्न, एम० ए०, एम्र० एल० ए०

सर्वोद्य साहित्य माला १०४ वाँ गन्थ सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्‍ली शाखाएँ--द्ल्‍ली : लखनऊ : इन्दौर

मार्च १६७१ ; ११००

मुल्य एक रुपया

प्रकाशक, “उठक, मातंण्द उपाध्याय, श्री महेन्द्र, मत्त्री, सम्ता साहित्य मण््दल, भाहित्य प्रेस,

कनाट संस, नई दिखी सिविल लाइन्स, आगरा

विषय-सूची

१--सेधर्कों की शिक्षा २- गाँवों और प्मीणों की सेवा ३--बीमारों की सेवा ४--अपडू-कुपढ़ों की सेवा ४--अपने नगर की सेवा ६--रिजनों की सेवा ७--पशुओं की सेवा ८-ात्रियों की सेवा ६£--स्वाध्याय द्वारा सेवा १०--साहित्य और लेखनी द्वारा सेवा ११--विद्यार्थी और लोक-सेवा १२---संस्थाओं की सेवा

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इस पुस्तक के लिखने में निम्नलिखित पत्रों ठथा पुस्तकों से नहावता ली गयी है--

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१4 “अज्नी हक (5 ... पा कई हिन्दी और अ्रओेती के मासिक, साप्ताहिद और देनिक पत्र।

आत्म-निवेदेन

सेवा-धर्म मेरी पैन्रिक सम्पत्ति है मेरे पूज्य पिता परिहत ब्जतलाल पालीवाल का जीवन सेवामय था। उनके जीवन का अधिकांश भाग दूमरों की नि स्वार्थ सेवा में ही बीता | गौओं और गरीब किसानों की र्षार्थ वे अपना समय ओर अपनी सम्पत्ति लगाते तथा शक्तिशाली भूम्वामिश्रों से लड़ाई मोल जे कर अपना जीवन खतरे में डालते थे। भूखों को अन्न तथा नड्ढों को वम्त्र बाँठते थे सबको चिकित्सा मुफ्त करते थे। वैयक करते हुए भी उन्होंने जीवन भर में फीस की पाई तक नहीं ली और कभी किसी को दवा ही बेची | अमीरो को नुस्खा लिख देते थे, गरीबो को दवा भी अपने पास से देते थे। गरीबों का इलाज करने के लिए दस-दस बारह-बारह मील तक पैदल जाते थे, और अमीरों का इलाज करने के लिए उनकी सवारी से काम लेते | पीड़ितों की सहायता करने की उनकी प्रवृत्ति इतनी प्रचत्त थी कि चाज्नीसा के श्रकाल में उन्होने पितामह की अनु- स्थिति में ख़त्तो खोल कर भूख से तड़पने वाले गाँवषालों को बॉट दी अन्न, वस्त्र, दवा आदि से सुपात्रो की, सहायता करने के लिए वे अपने चिकित्साधीन अमीरों से दान केते और घर के कपडे वतेन बगेरः उठा ले जाते

बचपन में रामचरित्तमानस का मेरे हृदय पर'वहा प्रभाव पड़ा। रामायण में जब सें यह पढ़ता था कि राम और लक्ष्मण गुरुजनो से पहले उठकर उनको यथायोग्य प्रणाम करते और फिर भाँति-माँति से उनकी सेवा करते थे और अपने इन्हीं गुणों के कारण वे उनके परस प्रिय बन गये तब में पुल्ककित हो उठता

(२)

ओर निश्चय करता कि मैं भी इस महार्‌ पुरुषों के प--चिहों पर चलूँग। ; और अपने इस निश्चय के अनुसार मैं अपने चरित्र और अपनी सेवाओं द्वारा अपने गुरुजनों को प्रसन्न रखने का अयत्न करता | आज भी यह स्मरण करके मुझे अत्यन्त हए और सुन्तोप दोता है कि मैं सदेंव अपने पृज्यों का प्रिय पात्र रद्द स्वर्गीय पित्ताजी ने मेरी इस सुप्रइत्ति को और भी पुष् 'किया। वे कद्दते 'तुस्त अंग्रेजी पढ़कर क्‍या करोगे? व्यायाम करो और हनुमान वनकर सबलों से निवलों की रक्षा करो!” मैंने तो अग्रेजी पढ़ना ही छोड़ा और हनुमान द्वी वन सका परन्तु सबक्षों के अन्याय से पीड़ित निवलों की सेवा-मद्ायत्ता करना मेरे जीवन का लक्ष्य बन गया।

सम्मवतः सन्‌ १६१७ की जात है उन दिलों में आगरा कालेज में पढ़ता था | उन्हीं दिनों आगरा में प्लेग का प्रकोप हुआ | परिडत ठाकरपसाद शर्मा एम० ए०, एल-एल०वी० वत्तेमान एग्जीक्यूटिव आफीसर मेरे महपाठी थे। उनके तथा श्रोयुत 'निरज्नल्ञाल पो प्रश्नांत मित्रों के सहयोग से एक सेवा-समिति स्थापित हो चुकी थी। जिसने अकाशन-कार्य में सबसे पहले सेरा ”विद्या पढ़ो” शीर्षक टेक्ट प्रकाशित किया था। कुछ रात्रि- पाठशालायें छायम की थीं तथा पुस्तकालय, वाचनालय और अध्ययन-मस्डल्न भी स्थापित किये थे | प्लेग में मी इस समिति के सदस्यों ने यथाशक्ति अपने कत्त व्य का पालन किया।

इस प्रकार कई सुहृद-मित्रों के चिरस्मरणीय सम्पश्न और सहयोग से मुझे पहले-पहल संगठित रूप से सेवा-कार्य करने का सुअचसर मित्रा और मिल्ली सेवा-कार्य की व्यावह्मरिक शिक्षा तथा मेरी सेवा-सस्वन्धिनी सुभावनाओं को स्थायी शक्ति |

.हैंदी सुभावनाश्रों से ओ्ेरित होकर मैंने संवत १६७४ में ज्ाहौर के फोरमेन क्रिश्चियत कालेज के अधानाध्यक्त फ्लेमिन्न

(३)

साहब की “5ए.8०४7णा5 (० 50००) मनिद॑रपिंगदघ्' नासक पुस्तक का हिन्दी अनुवाद किया जिसे साहित्य-रत्न-कायो- क्षय ने “सेवा-मा्ग” के नाम से प्रकाशित किया समाल्लोचकों ने सोत्साह उसका स्वागत किया। हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं में द्वी नदी, “लीडर” और “माइने रिव्यू” आदि मे भी उसकी पूरी पूरी प्रशंसा की गयी सेवा-धर्म की दृष्टि से भारत में पिछली दो दशाव्दियों में, दो शत्ाव्दियों के बराबर काम हुआ है। फलत: १६३० में में यह अनुभव करने लगा कि इस समय सेवा का सन्‍्माग बताने तथा सुमानेवाली पुस्तक की परम आवश्यकता है। फ्लेमिज्न साहब की पुरानी पुस्तक से अब काम नहीं चल सकता--उसकी सामायिकता और उपयोगिता बहुत कुछ, बढ़ाई जा सकती है

सयोग से इन्हीं दिनों भ्रीयुत महेन्द्र जी से मेरी बाते हुईं श्रीयुत महेन्द्र 'सेवा-मार्ग” के परम प्रशमकों में से हैं "सेच्रा- मांगे” के स्वणै-लेखनी-समिति वाले अध्यायों को पढ़कर उन्होंने मुमे जो पत्र लिखा था उसीसे पहले-पहल मेरा और उनका परिचय हुआ था! उन्होंने मुकसे कहा कि यदि मैं सेवा-मार्ग को फिर लिख दू' तो वे उसका नवीन संस्करण प्रकाशित कर देंगे। मैंने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, जिसके फलस्वरूप सन्‌ १६३० के अगस्त मास में, भाँसी जेल्न में मैंने सेवा-मार्ग को स्वतन्त्र रूप से लिखना शुरू कर दिया ! प्रस्तुत सेवा-सागे का बीमारों की सेवावाला अध्याय वद्दी लिखा गया है।

उसके बाद ममटों के मंकावात ने कुछ समय के लिए तो सचमुच ही साहित्यिक मृत्यु कर दी। कई सात्न तक कुछू भी किया जा सका | सन्‌ १६३४ जनवरी-फरवरी में कई साल बाद जब कुछ साँस लेने का अवसर मिला, तब उसी का लाभ उठाकर इतने दिनों के अध्ययन के फल “सिवा-मार्ग” को

पूराकिया

प्रस्तुत पुस्तक मूल पुस्तक से बिलकुल स्वतत्र है। स्वाध्याय द्वारा सेवा वाला अध्याय एक प्रकार से बिलकुल नया है। गाँवों की सेवा वाले अध्याय तो बिलकुल नये हैं

जल्दी में निश्चय ही अनेक तन्रटिया रह गयी होंगी। कुछ च्रुटियो को तो मैं स्वयं अनुभव कर रहा हूँ। परन्तु मुझे आशा ओर विश्वास है कि पुस्तक जेसी है वेसी दी उस उद्देश्य को पूरा करने में वेकार नहीं सावित होगी जिसके लिए बह लिखी गयी है

आमन-सुधार की आवश्यकता का अनुभव कर और उसकी विशेष चर्चा देख कर गाँव वालो की सेवा और सेवकों की शिक्षा वाले अध्याय विशेष रूप से लिखे गये हैं। भेरा विश्वास है कि गाँवों में काम करने वाले व्यक्तियों के लिए यह पुस्तक उपयोगी साबित द्वोगी

निवेदक

श्रीकृष्णदत्त पालीवाल

सेवकों की शिक्षा ++&६०8४०४३४०

सेवा की आवश्यकता को अनुभव करते ही सेवकों की शिक्षा का प्रश्व उठ खड़ा द्ोता है। वास्तव में, दोनों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। संस्कृत में एक श्लोक है, जिसका अर्थ यह है कि सेवा-कार्य इतना गहन है कि योगियों के लिए भी आसान नही-- उनके लिए भी वहाँ तक पहुँचना कठिन है। परन्तु सेवा-कार्य में केवल चित्त की वृत्तियों के निरोध से तथा भम्नता, अहंभाव- हीनता, स्वार्थशून्यता, सुशीलता, धेये, कष्ट-सहिष्ुता आदि शुणणों से दी काम नहीं चल्त सकता; उसके लिए विशेष शास्त्रों के अध्ययन और विशेष प्रकार की शिक्षा की भी अनिवार्य आवश्यकता है।

अपने अर्वाचीन रूप में समाज-लेवा का भाव स्वयं अपनी बाल्यावस्था में है। इसलिए यदि अभी लोगों ने सेवकों की शिक्षा की आवश्यकता की गुरुता को नहीं समझ पाया है, तो इसमें आश्चय की कोई बात नहीं! फिर भी पाश्चात्य देशों में समाज- सेवा के कार्य के लिए सेवकों की विशेष शिक्षा की आवश्यकता अनुभव कर के अनेक स्कूलो, कालेजों तथा विश्वविद्यालयों द्वारा “उसकी आयोजना कर दी गई है।

श्द सेवाघर्म और सेवामार्ग

नगर-सेवा के लिए सेवकों को शिक्षा को आवश्यकता वताते हुए आचाये शिवराम मेहताजी कहते हैं. कि "हर शख्स इस वात को संजूर करवा है कि कोई भी डाक्टर केवल सद्भावों--अच्छे इरादों के वक् पर चिकित्सा का काम योग्यता-पूवेक नहीं कर सकता--चिकित्सा करने के लिए उसे विशेष प्रकार की शिक्षा और अध्ययन की, डाक्टरी पढ़ने की आवश्यकता होती है।” इसी तरह अच्छे वकील होने के लिए एल-एल० बी० पास करने और उसके वाद भी एक साल तक ट्रेनिंग पाने की, कार्य सीखने की, जरूरत होती है! तो क्या नगर या प्राम-सेवा का काम ही इतना सरल है. कि उसको सस्वक्‌ रूप से करने के लिए किसी प्रकार की तैयारी, अनवरत उद्योग, शिक्षा और अध्ययन की आवस्वे- क॒ता नहीं ? सच चात तो यह है. कि अपने नगर के प्रति सच्चाई से अपने कर्तव्य के पालच करने का काम डाक्टरी और वकालत के काम से कहीं अधिक जटिल और कठिन हैं। सेवा का काम अवैतनिक होने के मानी यह नहीं है वह सदस्य सफल उद्योगों के इस नियम की अवहेलना कर सके। उद्योग की सफलता के लिए आवश्यक सद्दानुभूति के साथ-साध यद भी आवश्यक है कि उद्योग पर्याप्त तथ्यों और वैज्ञानिक सत्यों के आधार पर किया जाय

प्रोफेसर हैं (3858 ) ने भी अपनी [0 007०४७०) +0, 8500008ए नामक पुस्तक में इस विषय की विवेचना की है। पुस्तक के पिचानवे प्रष्ठ पर उन्होंने उत पाव्य-क्रमों का उल्लेख किया है, जो १६१२-१३ की सर्दी में कोलन ( 00089० ) के नगससेवा की शिक्षा देने वाले स्कूल में पढ़ाये जाते थे। दे विषय ये हैं--

नागरिक-शास्त्र, कानून, ३े शासन-सम्बन्धी कादून,

सेवकों की शिक्षा १६

स्थानीय-आज्ञाएँ, दीवानी जाव्ते की कारवाइयाँ, अरथ-शास्त्र, साख और विनिसय, कर, राजस्व, १० अडड-शास्त्र ११ निरीक्षण के दद्ठ, १९ मजदूरों सम्वन्धी कानून, १३ मजदूर- सद् तथा मजदूरों की अन्य सभाएँ, १४ सामाजिक बीमा, १४ ल्लोक-सेवा-्काये, १६ सामाजिक प्रश्न, १७ आग का बीसा, १८ आरोग्य-संरक्षण शास्त्र, १६ नगर वसाने की योजना, २० स्कूल, २६१ भौगोलिक तथा स्वास्थ्य-सम्वन्धी माप-खोज, २२ रासायनिक उद्योग-धन्ये, २३ लोहे की मशीनो के कारखाने, २४ कोयला और खातें, २५ बिलली की प्रक्रिया, २६ कृषि- प्रबन्ध, २७ रैन ओर वेस्टफल का भआर्थिक विकास, २८ राइन- लैण्ड की कलाएं और वहाँ का इतिहास, २६ पैरिस और उसके रहस्य |

परन्तु इस विषयकावहुत ही सुन्दरऔर विशद्‌ वर्णन श्रीमती एलीजावेथ मैकइम एम ए० (ग्राइ७08७॥ (808 0७7) ,.4 .) ने अपनी 708 #0797676 एप ४08 800७9। ज0पे0' नामक पुस्तक में किया है। आप स्वयं एक सुप्रसिद्ध लोकसेविका हैं, जिन्होंने सेवको की शिक्षा का काम भी किया है। महिला विद्यात्रय बस्ती (जे००७०॥'४ ए7ए०थ५ज 90#0007/) ने लोकसेवकों की शिक्षा के लिए जो योजना बनाई थी, उसके अनुसार पहले आपने स्वयं शिक्षा प्रहणु की! फिर आपसे लिवरपूल की बिक्‍्टोरिया सेटिलमेन्ट की वाडेन (अध्यक्षा ) का काम किया। फिर यहीं के विश्वविद्यालय सें आपने “समाज- सेवा-कार्य की क्रिया और तरीकों की” लेक्चरार ( अध्यापिका ) मुकरेर हो गई'। १६१६ में आप सामाजिक अध्ययन के लिए विश्वविद्यालयों की सम्मिलित फॉसिल की अवेतनिक भनत्राणी मुकरेर हुई और साथ-दी-साथ स्वियों की एक सभा की पदा- घिकारिणी दो गई इस महिला-सभा की शाखाएँ भ्रेटमिटेन भर

२७ सेवाधमे और सेवामागे

8 3 23:05 00 200 220 55 में फेली हुईं थीं और महिला वोटरों की शिक्षा इन सभाओं का एक मुख्य काये था। इस प्रकार आपने समाज-सेवकों की शिक्षा-सम्बन्धी आन्दोलन को, विद्यार्थी, व्यावहारिक कार्यकर्ता, अध्यापक, सामाजिक अध्ययन के लिए सदस्य, विश्व-विद्यालयों की सम्मिलित कोंसिल के सेक्रेटरी और ओसत नागरिक, सब की दृष्टि से देखा है। श्र

मिस सागरेट सीवेल ( 0/87290 50ए७। ) से आपने सेवकों की शिक्षा-सम्बन्धी आन्दोलन का प्रारम्भिक इतिहास भी प्राप्त कर लिया, जो इस प्रकार है--

पहल्े-पहल उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में, उन कोंसिलों और सोसाइटियों, कालेज मिशनों और सैटिलगेटों की स्थापना हुई, बिन्होंने गम्मीरता तथा विचारपूवंक सामाजिक रोगों को दूर करने के लिए संगठित उद्योग प्रासम्म किया। इसी समय लोगो ने यह सममा कि सम्राज-सेवा का कार्य वेयक्तिक धर्म का ही भाग नहीं है, प्रत्युत एक सामाजिक कत्तेज्य है। इसी समय लोगों ने यह सममा कि हमें उन कठिनाइयों को हल करना है, जो हल किये जाने के लिए हमारे सामने उपस्थित हो रदी हैं और जिनके हल करने के लिए मस्तिष्क और हृदय दोनों के गुणों की आवश्यकता है। इस समय तक इ्लेख्ड निवासी गरीबी के रोग की चिकित्सा और रोक के सस्वन्ध में विधेयात्मक विचार सोचने लगे थे और ये विचार सामाजिक कानूनों के रूप में प्रकट होने छृगे थे। घीसवीं शवाव्दी के शुरू में साव॑जनिक स्वास्थ्य, किराये के मकानात, नौकरी को स्थिरता, तथा नैतिक, सामाजिक और अपराधो-सम्बन्धी स्वास्थ्य की चिकित्सा के नये

आदशों से प्रेरित हो कर अ्रभूतपूषे सामाजिक कानून बने, जो महायुद्ध छिंड़ने तक बनते रहे

सवका का शक्ता २१

अम्ाज-सेवा के नये भाव के कारण समाजसेवी शह बेती.. के नये भाव के कारण समाज-सेवो- ले बीती संस्थाओं की वाढू-सली गई। इन संस्थाओं के काय के सिलसित्ते मे लोगों ने महसूस किया कि समाज-सेवा के काये से नये ढंग की पब्लिक सर्विस का अस्तित्व हो गया है और इस सर्विस के लिए शिक्षा का काय भी धीरे-धीरे प्रारम्भ हो रहा है। जहाँ लोगो ने यह अनुभव किया कि कहे जाने योग्य कार्य तो समाज-सेवा का ही मार्ग है, वहाँ समाज-सेबी कार्यकर्ताओं ने भी यह अनुभव किया कि काये के साथ-साथ हमें उन अवस्थाओ पर भी ध्यान देना होगा, जिनमें कार्य किया जाता है और कारयकर्त्ताओं के शरीर तथा उनके मस्तिष्क पर इन अव- स्थाओं का जो प्रतिघात होता है, उसकी उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। ये अवस्थाएँ और प्रतिक्रियाएँ दिन-पर-दिन अधिका- घिक जटिल होती जा रही हैं और इन अवस्थाओ की उन्नति करने और प्रतिक्रियाओं का सुधार करने का काम ललितकला का-सा काम हो गया है, जिसके लिए विशेष ज्ञान और शिक्षा की आवश्यकता है। सद्भावना, दया, सहज कार्यकुशलता और अनुभव सभी आवश्यक हैं। इनके बिना ज्ञान शुष्क और थोथा है; परन्तु ये गुण भी ज्ञान बिना अन्धे और बेतुके हो जाते हैँ। इसलिए यदि समाज-सेवा के काये को एक घन्धे की तरह अपना समुचित महत्त्व प्राप्त करना है, जैसा कि उसे करना चाहिए तो इस बात की आवश्यकता है कि इस कार्य की शिक्षा का प्रवन्ध होना चाहिए

समाज-सेवा का चहुत-सा कॉम तो आजकल प्रत्येक सभ्य देश की सरकारें स्वयं करती हैं। सरकारी महकमे.के काया के लिए निम्नलिखित कार्यकर्ताओं की आवश्यकता पढ़ती है; फैक्टरी इन्सपेक्टर, नेशनत्न इंस्वेफरयू, कोस्प्पपफकर द्छ्‌

कि.

श्र सेवाधर्म और सेवामार्ग

अनुसार काम करने वाले इन्सपेक्टर, वच्चों के इन्सपेक्टर, सैनीटरी इन्सपेक्टर और द्ेल्थ विजीटर, नौकरी-विनिमय सह्ों ओर वाल्-नौकरी क्मेंटियों के सेक्रेटरी और क्लक, बच्चों की सावधानी रखने वाली कमेटियों और बच्चों की संस्थाओं के संगठन कर्चा, बुढ़ापे की पेंशनों के हकदारों के दावों की जाँच, स्यूनिसिपैलिटी वरगेरः के मकानों के प्रवन्धक और किराया इकट्ठा करने वाले, महिला पुलिस, प्रोवेशन अफसर तथा रिल्ी-.« विड्ठ अफसर

गैर-सरकारी संस्था में निम्नलिखित कार्यकर्ताओं की आव- श्यकता होती है--

कारखानों, उद्योगालयों तथा व्यापारिक दफ्तरों में सेवा-कार्य करने वाले, समाज-सेवा करने वाली कॉंसिलों के मंत्री या आार्गेनाइजर, अस्पदाल के आल्मनर, दावव्य सह, वाल- हित ए्जेंसी, क्रव, सामाजिक इन्स्टीव्यू दस, छुट्टी के फरड, आम्य-संघ, गिरजाघरों और धार्मिक-संस्थाओं के सामाजिक काय करने वाले और सैटिल्मेण्टों के कार्यकर्ता

इन सब तथा इस प्रकार के अन्य कार्यकर्ताओं का नाम सिविल सर्वेन्टों और पार्लियामेन्ट के मेम्चरों के साथ लिये जाने पर चहुत से लोग चौकेंगे, फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि सामाजिक प्रवन्ध में ये कार्य कर्ता भी अपना काम करते ही हैं) और जिस प्रकार वड़े से वड़े अफसर को विशेष शिक्षा की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार इन्हें भी समाज-सेवा-कार्य के लिए विशेष शिक्षा की आवश्यकता है।

& आहमनर उस ज्यक्ति को कहते हैं, जो सहायता पाने वाले व्यक्ति की दुशा की जाँच करके उसकी पात्रापात्रता का निर्णय करता है तथा उससे मिलते-जुलते रह कर उसकी निगरानी करदा रहता है

सेवकों की शिक्षा श्३्‌

समाज-सेवा के कार्य के ऊपर जो नमूने दिये गये हैं, उनसे पाठक यह भी समझ गये होंगे कि इस कार्य से समाज-सेवक अपनी जीविका का प्रश्न भी हल कर सकते हैं। जिस प्रकार लोग जेल-विभाग वगैरः में मद्दीनों और वर्षों मुक्त एप्रेन्टिसी करते रहते हैं, उस प्रकार यदि समाज-सेवा के काये की व्यावद्दा- रिक शिक्षा लेने के लिए कुछ समय दें, तो अपनी आत्सिक उन्नति के साथ-साथ आजीवन समाज-सेवा करते रहने के लिये जीविका का प्रवन्ध भी कर सकते हैं और इस प्रकार अपना इद॒लोक ओर परलोक सम्हात सकते हैं। प्रत्येक संस्था को योग्य प्रचारकों की, भजनीकों की, संगठन कत्ताओं और संचालकों की, क्लकों ओर सन्त्रियों की आवश्यकता है। अनेक लोक-सेवी कार्यकर्ता इल बातों की दक्षता प्राप्त कर के आजीवन अपना तथा अपने परिवार का भरण-पोषण करते हुए समाज-सेवा का पवित्र काये कर सकते हैं |

यद्यपि पाश्चात्य देशों में भी सेवकों की शिक्षा का काम पहले गैर-सरकारी व्यक्तियों और संस्थाओं ने ही शुरू किया, परन्तु इड्लेण्ड के विश्वविद्यालयों ने उसे शीघ्र ही अपना लिया। वास्तव में नये ढन्न से सेवा-कार्ये के सख्बालन और सदह्भठन में चहाँ के विश्वविद्यालयों ने प्रमुख भाग लिया और इस सम्बन्ध में जितने मुख्य आन्दोलन वहाँ हुए, वे अधिकतर विश्वविद्यालय गा तथा उदारमता स्त्री-पुर॒षों की ओर से ही उठाये गये

गैर-सरकारी व्यक्तियो में सब से पहले साउथव्क की बोमेन्स यूनीवर्सिटी सैटिलमेण्ट ने सेचको की शिक्षा का कार्य शुरू किया। इस सेटिलमेण्ट की स्थापना आक्सफोडे तथा कैम्न्रिज़ के वोमेन्स कालेजों (ज्यों के कालेज़ों ) ने की थी। पीछे से ल्न्दन

२४ सेवाघर्म और सेवामा्ग

बिश्वविद्याहय इसमें शामित्न हो गया था | इस बस्ती छा उद्देत्व - साउ्यवर्क जेसे दरिद्ध तथा कठिन जिले में समाज-्सेवा का काम करना था। इस बस्ती में कुछ कार्यकर्ता स्थायी रूप से रहते थे और छुछ धोड़े समय के लिए इनमें अधिकांश समाज-सेविकाएँ अपने घरों में रहते हुए प्रति दिन या प्रति सप्ताह इस वस्ती के काम में भाग लेती थीं। थोड़े हो समच में इन समाज-सेविकाओं ने चह अनुभव किया कि दीनों की सेवा के छार्य में सद्भावना के साथ-साथ ज्ञान और शिक्षा की भी परम आवश्यकता है| कार्य करने के लिए इन लोक-सेविकाओं ने अपने छोटे-छोटे मरढठत्त चना लिए थे अत्येक समसढल अलग-अलग अपनी-अपनी विशेष कठिनाइयों का अनुभव कर रहा था। इन पर विचार करने के लिए सरढल की वेठकें होतीं, जिनमें पत्यक्त कठिनाइयों और वेयक्तिक उदाहरणों का वन किया जाता और फ़िर उद्द पर बिचार तथा विवाद होता। कमी-कर्ी सण्ह्त की अध्यक्ता निवन्ध पढ़ कर सुनाती जून १८६८० में अध्यत्षा ने अपने निवन्ध में कह्य कि “चहाँ कुछ भी समय काम करने के क्षिए जो श्रीमती आवें, उन्हें पहले किसी पूरे तथा सद्ठित कार्य के सिल- सिल्ते में नियमित शिक्ता-क्रम ग्राप्त कर लेना चाहिये, तभी वे सेवा तथा सहायता के सच्चे सिद्धान्तों को समझ सकेगी; तभी वे जान सकेगी कि गरोबों की जरूरतें क्या हैं, और उन जहूरों को पूरा करने के लिए कौन-छोन-सो एजेंसियाँ पहले ही से काम कर रही हैं इसके साथ-द्ी-साथ वे उन लोगों से परिचय भी श्राप्त कर लेंगी, जिनमें उन्हें काम करना है और यह भी तय कर लेंगी कि काम की किस विशेष दिशा की ओर उनका मुकाव सच से अधिक है और वे किस कार्य के लिए सबसे अधिक उपयुक्त हैं?? इस नियमित शिक्षाक्रम का श्रीगणेश इस प्रकार किया गया। अध्वक्षा ने इत प्रारन्भिक भाषणों में पहले से विद्यमान

सेवकों की शिक्षा २५

_सेबा-संस्थाओं का वर्णन किया। मिस्टर वर्ना३ वीसैन क्वैट ने सैटिलमेण्ट में आकर चार व्याख्यान दिये। पाँच कान्फेंसें की गई। दान और सेवा के इस काय को अधिकतर ख्त्रियाँ ही करती थी।

१८६३-६४ में शिकागो ( अमेरिका ) में सैटिलमेण्टो की जो कार्फ हुई थी, उसके एक निवन्ध में कद्दा गया कि सैटिलमेण्ट साल में तीन सरतवा अपने यहाँ अथे-शासत्र, गरीबों के कामून, स्थानीय शासन, शिक्षा, सफाई, सब्नठन, सहायता, मितव्ययिता के सिद्धान्तो पर व्याख्यान कराये जायेंगे।

पाठ्य-क्रम नियत कर दिये जायेंगे ओर विद्यार्थियों से जिन विषयों का वे अध्ययन कर रहे हैं, उन पर लेख लिखाये जायेँगे। इस पुस्तक-आ्ञन के साथ-साथ अनुभवी कार्य-क्ताओं की अधी- नता में उनसे व्याबह्यारिक काम भी कराया जायगा। सैद्धान्तिक और व्यावद्वारिक दोनो प्रकार की शिक्षा का क्रम तैयार फरते समय, समस्त कार्ये-कत्ताओ को, लोगों के जीवन के भिन्न-भिन्न पहलुओं का अध्ययन करने और परोपकार तथा लोक सेवा के कार्य के विविध पक्षी के देखने का भरपूर अवसर मिले इस बात का पूरा-पूरा ध्यात रक्खा जायगा। गरीशों को केवल उसी समय देखना, जब उन्हे सहायता की आवश्यकता होती है, या उनके केवल एक ही वगगे को देखना अमोत्यादक है। पीड़ितों की सेवा और सहायता के कार्य का पीड़ा को रोकने के कार्य से क्या सम्बन्ध है तथा व्यक्ति के कार्य को राष्ट्र के कार्य से किस प्रकार सम्बन्धित करना चाहिये, इत्यादि बातें बताना भी आवश्यकीय है।

सन्‌ १८६३ में इस सेटिलमेण्द ने ऐसी दो महिलाओं को छात्रचृत्तियां दी, जो समाजन्सेवा के काये की शिक्षा श्राप्त करना

रद सेवाधम और सेवामाग

दमकल कप कक मल मी चाहती थीं, पर अर्थामाव से कर नहीं सकती थीं। इसी समय शिक्षा-्काय का सज्ञठन तथा विज्ञापन किया गया। इसी साल की रिपोर्ट में “व्याख्यानों का कार्यक्रम” छपा जिसकी भूमिका में कद्दा गया कि लोक-सेवी कार्य-कर्त्ताओं की इस शिक्षा का उद्देश्य समाज-सेवा के कार्य को उन्नत करना और शिजित कार्य- कर्तताओं की माँग को पूरा करना तथा कार्य के लिए कार्य को तैयार करने के लिए अब वक जितना उद्योग किया गया है , उससे अधिक व्यवस्थित उद्योग करना है। इसके वाद रिपोर्ट में योजना का ढाँचा दिया गया है और स्थानीय तथा वाहर के विद्यार्थियों को शिक्षा पाने के लिए निमन्त्रित किया गया है. तथा क्षिक्षा की फीस नियत की गई है। अनेक निवासी जो विद्यार्थी की हैसियत से आये भरती कर लिये गये। सेटिल्लमेण्ट में तीन ठर्मों तक साप्ताहिक व्याल्यान कराये गये। कुछ व्याख्यान अध्यत्ता ने स्वव॑ दिये और कुछ हिवैषी विशेषज्ञों ने खेच्छा से दिये। उदाहरणार्थ अर्थ-शात्र के अनत्य आचाय रालफ्ोड मार्शल की विहुपी पत्नी ने “मजदूर और उत्की सजदूरीए पर कई व्याख्यान दिये। ढाक्टर लौंगस्टाफ ने “लन्दन के स्थानीय शासन” पर दो व्याल्यान दिये। “आरम्सिक शिक्षा? पर म्रिस्टर जी० ए० पी० ओ्रेब्ज ने चार व्याख्यान दिये पूञर ला कान्फ की सेन्‍्ट्रल कमेंटी के आनरेरी सेक्रेटरी मि० चाँस ने ारीबों के कानूतएण (72007 7/8७ ) पर चार व्याख्यान दिये "फेक्टरी एक्टों”, “मितन्यविता”, “दिसाव-किताव रखने”, "सावंजनिक स्वास्थ्य” तथा “गरीबों की सद्दाचता के सिद्धान्तों और दंगों? पद भी व्यास्यान कराये गये। १८६४ में कार्य-कर्ताओं का शिक्षा-सम्बन्धी अनुभव व्याख्यानों तथा लीफ- लेटों द्वारा दूसरे आन्तों तक पहुँचाया गया। इसी साज्न फीफर विक्वैट के ट्रस्टियों ने इस सैटिलमेस्ट को उन स्त्रियों की छात्र-

सेवकों की शिक्षा २७

वृत्ति के ज्षिण तीस हजार रुपये दिये, जो लोक-सेवा-काय की शिक्षा भहदरण करना चाहें। इस दूरदर्शी दान से इस महत्वपूरं कार्य की नींव सदा के लिए जम गई १८६४ में तीन टर्मों तक पूरी व्याख्यान-माला फिर कराई गई, जिन्हें सुन कर श्रोता-गण यह कहने लगे कि यदि ये व्याख्यान केन्द्रीय स्थान पर कराये जायें, तो अधिक कार्यकर्ता उनसे लाभ उठा सकते हैं। इसी समय सैटिलमेन्ट, दान-व्यवस्था सोसाइटी तथा नेशनल यूनियन आफ बघोमेन बकेस ले मिल कर “सम्मिलित व्याख्यान कमेटी” नाम की एक कमेटी बनाई जिसका उद्देश्य लन्दन के केन्द्र में उपयु क्त व्यास्यान-मालाओ का प्रबन्ध करना था। १८६७ की दो टर्मों में इस कमेटी की ओर से व्याख्यात कराये गये इसके कुछ समय बाद द्वी कमेटी ने अपना प्रभाव- ततेत्र बदाना चाह्य और उससे एक बेतनिक लैक्चरार मुकरर कर दिया, जो लन्दन में ही नहीं प्रान्त भर में व्याख्यान दे सके। १६०१ तक इस कमेटी की ओर से व्याख्यान दिलाये जाते रहे। १६०१ में इस कमेटी के स्थान पर “सामाजिक अध्ययन-कमेटी” नाम की एक कमेटी बनी, जो लन्दन दान-व्यवस्था की एक उपन्सम्िति थी। इसी “सामाजिक अध्ययन-कमेटी» ने काल्नान्तर में पहले “अथे शास्त्र और समाज-शास््र के स्कूल” का रूप धारण किया और अन्त में वह स्कूल राजनीति-विज्ञान और सत्र के लन्दन स्कूल का एक विभाग बन गया |

लोक-सेबियों की शिक्षा के कार्य से इड्डलैण्ड के विश्व-दिद्या- ज्यों का सम्बन्ध सन्‌ उन्नीस-सौ-तीन से प्रारम्भ होता है। इसी समय सर एडवर्डे ने, उस समय लिवरपूल विश्व- विद्या्षय में अथंशास्त्र के प्रोफेसर गौनर की छत्न-छाया मे सम्ाज-सेवकों की शिक्षा का प्रबन्ध करने की योजना सोची और सब्‌ १६०४ सें उन्होंने यूनिवर्सिटी, स्त्रियों के

श्प सेवाघम और सेवामार्ग

विक्टोरिया सैटिलमेण्ट और लिवरपूल की सैण्ट्रल रित्लीफ और दान-ब्यवस्थापक सोसाइटी के सम्मिलित उद्योग से "स्कूल ऑफ सोशल साइंस” स्थापित किया। शुरू में यूनीवर्सिटी से इस स्कूल का सम्बन्ध चूनीवर्सिटी परिवार-समुदाय के एक सम्मानित सदृत्व का-सा हो कर एक गरीब नातेदार का-सा था। स्कूल की अपनी अलग कार्यकारिणी कमेटी थी यहकमेटी ही उसकी विव- रणुपत्रिका चनातो थी, वदी विश्वविद्यालय के अनुशासन से खतनन्‍त्र परीक्षा का अवन्ध करदी थी। कमेटी ही कठिनाई के साथ स्कूल के लिए रुपया इकट्ठा करती थी। स्कूल के विद्यार्थी विश्वविद्यालय के रनिल्टढ विद्यार्थी नहीं माने जाते थे। और विश्वत्रिद्यालय के प्रोफेसर जो व्याख्यात देते थे, स्वयं अपनी जेच्चा से देते थे। विश्वविद्यालय ने स्कूल को केवल स्थान दिया था और उसको कमेटी के लिए अपने प्रतिनिधि चुन दिये थे, परन्तु क्योंकि प्रोफेतर गोनर स्कूल कमेटी के चेयरमैन थे इसलिए पब्लिक की निगाह में स्कूल विश्वविद्यालय का ही था। इसके चार माल बाद वरमिंघम विश्वविद्यालय ने आगे कदम बढ़ाया और पहली चार लोकस्सेवा-कार्य की शिक्षा पाने वाले विद्यार्थियों के नाम अपने रजिस्टरों में दर्ज किये, उनकी शिक्त की जिन्मेश्री अपने ऊपर ली और सफ्ल विद्यार्थियों के हिप्होमा दिया। इसके बाद ब्रिस्टल तथा लीड्स के विश्व विद्यालयों ने समाज-सेवा-फार्य की शिक्षा देना प्रारम्भ कर दिया ' स्काटलैरड के ण्डिनवर्ग और ग्लासगो के विश्वविद्यालयों मे इसी डिशा में प्रयोग करना शुरू किया। एटिनवर्ग के पाक- शास्त्र और गृहअबन्वन्शात् छे स्कूल ने १६११ में द्वियों के लिए लोकनसेबा-फा्य की शित्ता छा प्रन्‍न्ध किया।

मद्उद्ध से पहले सेवकों को शित्ता के काये की उन्नति की गति बहुत घीमो थी। ्रीसवीं शताब्दी के शुरू के सालों में

सेवकों की शिक्षा २६

तो सामाजिक कानूनो का प्रवाह वह रहा था और नये ढंग के सरकारी तथा गैर-सरकारी सामाजिक प्रयत्नों के लिये बेत॒निक संगठन कत्ताओ की हैसियत से कार्यकर्ताओं की माँग दिन-पर- दिन बढते लगी शुरू में स्त्रियाँ ही इस काये की ओर भझुकी और ब्ियाँ भी वे जो निःशुल्क सेवा-कार्य करना चाहती थीं !

, महायुद्ध के समय, लोक-सेवकों की शिक्षा के कार्य को आशातीत उत्तेजना मिली | इस समय शिक्षित कार्यकर्ताओं की माँग उनकी पूत्ति से चहुत बढ़ गई इसलिए सरकार के विश्व- विद्यालयों के समाज-सेवा-कार्य की शिक्षा देने वाल विभागों को स्व्रीकार करके उनको प्रोत्साहन देने के लिए बाध्य होना पड़ा। युद्ध/सामग्री के सन्त्रि-ससठल के लोक-सेवी विभाग (४४०७9 फ0609४४70॥ 6 'फाइएए एऐए प्य008 ) के लिए नवशिक्षित कार्य-कर्ताओं की पर्याप्त संख्या प्राप्त करना असम्भव हो गया, तब उसने उन विद्यार्थियों को छात्र-वृत्तियाँ देना शुरू किया, जो विश्वविद्यालय के लोक-सेचकों की शिक्षण- पाठ्शालाओं में दी जाने वाली शिक्ता को प्राप्त करं। तात्कालिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए, पीड़ित-सहायता-कार्य के लिए कार्यकर्ताओं की विशाल सेनाओं को शिक्षा दी जाने लगी लोक-सेवा-कार्य को शिक्षा पाना फैशन में शुमार हो गया। जून सन्‌ १६९७ मे एक कान्फ्रेन्स ने फैक्टरियों में लोक-सेवा-कार्य तथा मजदूरों के सेवा-मण्डलो के काम की शिक्षा देने का विशेष भ्रचन्ध किया।

शिक्षा-क्रम का नमूना

१६१७ भें ज्वाइए्ट युनीवर्सिटी कोंसिल ने “विश्वविद्यालयों में सामाजिक अध्ययन और शिक्षण” पर एक रिपोर्ट तैयार की, जिसको ?. 8. कगाए & 300 ने प्रकाशित किया है। <

३० सेवाध् और सेवामाग

अषरचरचत धटचट ५. अत अजीज

रिपोर्ट में कद्दा गया! कि इस समय निम्नलिखित तीन प्रकार के विद्यार्थी अखण्डर ग्रेजुएटों से अधिक हैसियत रखते हैं--

(क) ग्रेजुए्ट, (व) अमुभबी कार्यकर्ता जिसे पहले बहुत ही कम या कुछ भी सेद्धान्तिक शिक्षा नहीं मिली, (ग) पह विद्यार्थी जो मेट्रीक्यूलेट है अथवा किसी ऐसे कार्य में लगना चाहता है, जिसमें यदि और गुण हों, तो विश्वविद्यालय की डिग्री « आवश्यक नहीं है। अधिकाँश स्कूल इन तीनों श्रकार के विद्या- थिंयों की शिक्षा का अवन्ध करते हैं, यद्यपि कुछ स्कूलो में छानन- वृत्ति ग्रेजुएटों को ही मिलती है।

प्रैजुएटों के अलावा दूसरे लोगों के लिए शित्ता-क्रम दो साल का पूरा समय चाहता है। पहली साल सामाजिक विषयों के आम अध्ययन के लिए और दूसरी सात कार्न-विशेप की शिक्षा के लिए |

शिक्षा-क्रम में, कक्षाओं में या व्याख्यानों में सम्मिलित होता तथा-समाज-सेवा के विविध कार्यों में अमली हिस्सा लेना, दोनों शामिल हैं। पिछल्ली वात से विद्यार्थियों को मजदूरों के जीवन का, सावजनिक विभागों के सद्बालन का तथा सेवा-कार्य के लिए गेर-सरकारी सद्नों का निजी ज्ञान प्राप्त दे जाता है।

कज्ताओं में जिन शास्रों की सेद्धान्तिक शिक्षा दी जाती है,

ने मिन्न-मिन्न स्थानों पर मिन्न-मिन्न हैं, परन्तु आमतौर पर अय॑-शाश्न, आर्थिक इतिहास, सामाजिक और राजनैतिक दर्शन, सनोविज्ञान, पव्लिक के शासन आदि--सिद्धान्त सब जगह पढ़ाये जाते हैं। स्वास्थ्य-सुघार, मकानात के प्रवन्ध, वेकारों के लिए काम तलाश करने तथा पीड़ितों की सहायता आदि का काय सेवकों से कराया जादा है, उनसे सामाजिक अवस्थाओं की ? तथा अनुसन्धान का काम भी लिया जाग है। भिन्न-मिन्न

सेवकों की शिक्षा इ१्‌

सेवा-कार्य सेबकों को ले जाकर दिखाये जाते हैं। इन निरीक्षणों से विद्यार्थियों को बहुत लाभ पहुँचता है। जो लोग अपना पूरा समय सेवा-कार्ये की शिक्षा म्हण करने के लिए नहीं दे सकते उनके लिए डन्डी और ग्लासगो मे शाम को शिक्षा दी जाती है शिक्षा समाप्त होने पर परीक्षा ली जाती है और परी्षा में उत्तीर्ण होने पर डिसोमा या सार्टीफिकेट दिया जाता है। इस शिक्षा में डेद-सौ रुपये से लेकर साढ़े-चार-सौ तक व्यय पड़ता है।

श्रीमतो एलिजावेथ मेकडम्त का कहना है कि सेवकों को शिक्षा-सम्बन्धी आन्दोज्नन के पहले तीस साल तो केवल प्रयोग जग थे इसलिए अब आकर शिक्षा के उद्देश निम्वित्‌ हो पाये हैं

सामाजिक शास्रों और विज्ञानों के अतिरिक्त लोक-सेवियों को सामाजिक कानूनों के विवेचनात्मक अध्ययन को, उनके इतिहास, उनके नियस तथा परिणासों की जानकारी प्राप्त करने की भी परम आवश्यकता है। अमेरिका के स्कूलों में सेब्य-व्य- क्तियों, परिवारों और समुदायों के अध्ययन्त की शिक्षा भी दी जाती है। सेव्यों के घरों का निरीक्षण करने, पीड़ितों की सेवा- शुभ्रषा तथा सहायता करने तथा कज्ञबों के सब्ठठन और सच्ना- लन आदि का काम भी सिखाया जाता है। कुछ स्कूलों में व्यवसायों के प्रबन्ध, दफ्तर और कमेटी के काम, तथा साथे- जनिक व्याख्यान देने की भी शिक्षा दी जाती है।

शिक्षा का सब से अच्छा क्रम यह है कि पहले समाज- शास्त्रों में भरेजुएट की उपाधि की जाय फिर दो सात तक सेवा- काये की विशेष शिक्षा प्राप्त की जाय

श्रीमती एलिजावेथ भेकडम के कथनानुसार वीस वे पहले का विद्यार्थी लगभग सोलहो आने ज्यक्तियों के सौभाग्य और

इ्र्‌ सेवाब्न और सेवामार्ग

दुर्भाग्य छे प्रश्न में निमग्न रहता था, परल्तु अर्वाचीन विद्यार्थी व्यक्तियों की दशा सुधारने अथवा इनके दुःख दूर करने के इन हैय और चेकार ढंगों से उच्र जाते है ओर आशिक पुनस्स॑गठन की बड़ी-चड़ी योजनाओं में द्वी विश्वास करते है। चह प्रगति प्रत्ये् लोक-सेदी के लिए विचारणीय है और खाध्याय को आवश्यकता को और भी अधिक पुप्ठ करदी दे

उुशिज्षित लोऋअ-सेदी अपना काय-सन्बन्धी ज्ञान केवल पुलऊों से ही नहीं प्राप्त करेगा, वल्कि वास्तविक जीवन से प्राप्त करेंगा। यह चीज़ों को जैसी कि है बेसी देखता है, जैसी वे मानी जाती हू. बसी नहीं देखठा उसका व्यावहारिक अनुभव उसऊे व्यास्यानों को सजीब और चयाय॑ बना देगा। वह चाल्वविक जीवन को प्रयोग-शाला में कत्ता के हलों की परीक्षा

करेगा आर इन अवस्थाओं को हल करने के साथ-साथ इतिहाम, समाज-देशन और अथ-पिश्ञान की ज्यास्या पर ध्यान देगा।

पहली सात में आमतार पर पहली तिमाही में व्यावहारिक काय को अधिर सदृत्व देता चादिए। दूसरी भें कन तथा तोमरो में तर ऊम। इसरी साल विशेष शित्षा के लिए रहनी चाहिए। न्दाफ फे ऋूम से कम एक मेम्बर में तो इतनी योग्यता होनी ही दाटिए कि बह विद्यादियों को व्यावदारिर कार्य की शिता दे सर | ब्यावद्ारिक शिक्षा का मुल्य उ्टेग्य चड़ हैं छि शोर सेत्री को सेच्यों भी अवस्था छा पृण तथा महानुभृति पूर इन हो जाय --द्म पान के महत्व पर जिनना जोर दिया जाय £॥। यसार नानी-नामी दिद्वानों ने हुसी प्रजार सामा

डिझ अवम्थाणों और समस्पर्नों का गान प्राप्त क्‍्चा है झोसती मिदनी बैद कर सोमनी गस्मेजरगन ने मज़दनों ये देगा का ऋतपन झरने डे लिए न्यये फैक्टरी में ज्ञा फर का

सेवकों की शिक्षा इ३

0५/६:५३५०५२५००५०९:०९८५:न्‍पलन

से ब्रिटिश पालियामेण्ट की मेम्बर चुनी गई, उन्होंने गृह-सेविका का कार्य स्वयं करके गृह-सेविकाओं की दशा का ज्ञान प्राप्त किया। अमेरिका के नामी जेल-सुधारक मिस्टर मौट औसबोने जेल की दशा का अध्ययन करने के लिए स्वेच्छापूबेक जेल में रहे।

खास तौर पर भराम्य-समस्याओं की शिक्षा के प्रबन्ध के लिए प्रभी तक पाण्नात्य देशों में मी तुलनात्मक दृष्टि से बहुत दी कम क्राम किया गया है; यद्यपि प्रेटप्निटेन और अमेरिका दोनों के विश्व-विद्यात्ञयों में लोक-सेवकों की शिक्षा का कार्य एक अवि- च्छेय अह्ठ हो गया है।

हमारे देश में असी लोक-सेवा की शिक्षा का कोई उल्हेख- नीय प्रबन्ध नहीं है। यहाँ तो विश्व-विद्यालयो ने इस ओर ध्यान तक नहीं दिया

हाँ, आम-सेवकों की,शिक्षा के लिए कुछ गैर-सरकारी उद्योग, अवश्य किये गये हैं जिनमें यंगमैन क्रिश्चियन ऐसोसिएशन के' भद्गास के प्राम-सेवा-केन्द्रो की शिक्षा का प्रबन्ध, कवीन्द्र रवीन्दर के शान्तिनिकेतन का प्रबन्ध, प्रेम-महाविद्यालय वृन्दावन तथा काशी विद्यापीठ की ग्राम्य कार्यकर्ताओं की सेवा-कार्य की शिक्ता देने वाली कत्ताएं विशेष उल्लेखनीय हैं.। मिस्टर एफ, एल, ब्रेन ने इस सम्बन्ध में पञ्ञाव के गुरुगाँव बिले में विशेष उद्योग किया है। उन्होंने गुरुगाँव में आम-शात्त्र की शिक्षा का स्कूल ( 80000] ०॑ छेफथे 00०7० ) खोला है। इस स्कूल का सब से पहला उद्देश्य विद्यार्थियों को मेह- चत का महत्त्व सिखाना, है। दूसरा उद्देश्य है सेवा का आदरशे विद्यार्थियों के मन में अक्वित करना, जिससे उनमें स्वयं अपनी ||

३४ सेवाघम और सेवामार्ग

तथा दूसरों की सहायता करने की इच्छा उत्पन्न हो तीसरा उद्देश्य, जो वास्तविक शिक्षा दी जाती है उसके जरिये, उन्हें इस वात का विश्वास दिला देना है कि प्राम-जीवन की सब समस्याक्नों का हल हमारे पास सौजूद है। इस स्कूल के पहले विद्यार्थियों में व्यालीस अध्यापक थे, चार पटवारी और एक प्राइवेट विद्यार्थी, परन्तु पीछे से सरकार ने पटवारियों को स्कूल में शिक्षा पाने से रोक दिया। शुरू में एक सात्न की पढ़ाई ख्खी गई। यह साल प्रयोग का साल था। स्काउटिंग और सहयोग, शिक्षा के आधार-स्तम्भ हैं, क्योंकि संस्थापक की सम्मति में इन्हीं से स्वाव्म्वत, सहयोग और समाज-सेवा की शिक्षा मिलदी है। स्कूल के कुएं के आस-पास काफी जमीन है और स्कूल के पास इक्यावन एकड़ का फार्स है। अन्य विषय ये पढ़ाये ज्ञाते हैं--

अमली खेती

पआधातों की प्रारम्मिक चिकित्सा

बालकों की सेवा

स्वास्थ्य

गृह आरोग्य और स्वच्छ॒वा-शार्त्र

प्राम-आरोग्य-संरक्षण और सफाई का काम, जिसमें गाँव को साफ करने का असली काम करना पढ़ता है

महामारी-विज्ञान

सेवकों की शिक्षा

पशुओं की नस्ल सुधारने और पशुओं के इलाज का सीधा फाम 52

सब के लिए खेल। अगरेजी खेल। गाना। ज्याख्यान दैता। आम्यअचार और मैजिक-लैन्टने का उपयोग |

सेवकों की शिक्षा, श्ृ्‌

विद्यार्थी गाँवों में दौरा करके व्याख्यान देते हैं और भगाँदों की सफाई वगेरः का असली काम करते हैं। वे अपना काम ख़ुद ही करते हैं, जिससे वे मेहनत की इज्जत करना सीखें। वे नाटक लिखते और खेलते हैं क्योंकि प्रचार का सब से अधिक विश्वासोत्तादक साधन नाटक ही है। इस स्कूल में गाँव के पथ- प्रद्शक तैयार किये जा रहे हैं; जो दाकिम, स्बज्ष, जालिम यथा नवाब होंगे, सेवक, सहायक और उपदेशक का काम करेंगे। इन पथ-द्शंकों को ये काम करने पढ़ेंगे--

(१) आइडर छोड़ कर वैकु का सव काम। (२) फसल के शत्रुओं, चूहों, कुवरा कीड़ों, सेहयों वर्गेर: के मारने का काम (३) सावेजनिक स्वास्थ्य का काम | टीके लगवाने लायक लोगों की फेहरिस्त बनाना और लोगो को टीका लगवाने के लिए तैयार करना खाद के गड्ढे खोद कर तथा घरों में ख्िड़कियाँ बनवा कर गाँवों को सफाई करना। जन्म-ऋत्यु के रजिस्टरों का निरीक्षण हैजा रोकने का काम (४) मैजिक-लेन्टने द्वारा या उसके विना ही उपदेश देना | प्रद्शनी गाढ़ी सहित या उसके बिना भी, खेती, सहयोग, आरोग्य, उत्थान आदि फे सिद्धान्त गाँव वालों को सिखाना। (४) खेती के लिए उन्नत हल्ों तथा दूसरे औजारों का प्रदर्शत और उनको बेचना। उन्नत बीज, रहट, द्विसार के साँड, फूल लगाने का शौक वगेरः का प्रचार करना (६ ) लोगों को अपने लड़के-लड़कियों को भद्‌- रसे भेजने के लिए राजी करना; संक्षेप में आमोत्यान सम्बन्धी सब काम करना |

ये आम-पथ-प्रदर्शक गाँवों में जा कर गाँव वालों के बीच में ही रहेंगे इनके काम फा फल देख कर इन्हें दर्ड या पुरस्कार मिल्लेगा ये पथ-प्रदर्शक गाँव के बच्चे-बच्चे को जानते होंगे और

३६ सेवाधर्म और सेवामागे

5 80:00 302: गाँव का चच्चा-वच्चा इन्हें जान जायगा। ये उपदेश देंगे, प्रदू- करेंगे, सलाह देंगे, गाँव बालों की राय मालूम करेंगे, उन्नति की गाड़ी मूढ़ विश्वासों के गट्टों में कहाँ रुकती है यह जादेंगे। उनके सन्देहों और कठिनाइयों को रफा करेंगे, उनकी समस्याओं को हल करेंगे, उनकी तकलीफों के दूर करने का उपाय वतादेंगे। ऋव तक हमारा काम कागती था। अच हमें इत पय-प्रदर्शों से यह माल्स हो सकेगा कि भ्रामोत्यान सम्वन्धी हमारी योजनाओं के बारे में गाँव वालों की क्या राय है उनको हमारी तरक्की की कोशिशों में क्या-क्या ऐतराज हैं। हम अपनी भद्दी योजनाओं को प्रत्येक गाँव की परित्यिति के अनुसार सुधार सकेंगे और म्रामवासियों के मूढ़ विश्वासों के किले के समेस्थलों पर हसला कर सकेंगे। इसी तरह द्लियों को गृह-पवन्ध की शिक्षा देने के लिए एक स्कूल दै।

गाँवों ओर ग्रामीणों की सेवा

-+>«०ईै०0१&28०००

४गाँवों और प्रामीणों की सेवा का काये परमपिता पर- सात्मा का कार्य है।? --शादह्दी कपि कमीशन के सामने . गवाही देते हुए महामना मालवीयजी “बल्न उठ, यहाँ आँखें मेंदे हुए, और गोमुखी में हाथ डाले हुए क्या जप कर रहा है ? यदि तुमे इश्वर के दर्शन करने हैं तो वहाँ चल, जहाँ किसान जेठ की दोपहरी में हल जोत कर चोटी का पसीना एड़ी तक बहा रहा है |? --गीताज्जलि में रवीन्द्रनाथ ठाकुर “सूबे की अर्थिक दशा की हमने जो जाँच की है, उससे हमें पक्का विश्वास हो गया है कि किसानों की दशा सुधारने की बहुत सझत जरूरत है |? कि --थू० पी० बेड्डिक एनक्वाइरी कमेटी रिपोर्ट “पैरा विचार है कि जिस स्री-पुरुष में मनुष्यता का तनिक भी भाव है, उसे गावों और प्रामीणों की सेवा के शुम कारये

मे सहयोग देना चाहिए।” “*. -परिद्त मदनमोहन मालवीय

डरप सेवाघम और सेवामा्ग ग्रामीणों की सेवा का महत्व

हिन्दुस्तान आमों का देश है। इसके नब्बे फीसदी के लगभग विषासी गाँवों में ही रहते हैं। गरीबी, अवान, बीमारी आदि से ये सदेव प्रसित रहते हैं। इसलिए हिन्दुस्तान में लोक-सेवकों का काये का अंश तक गाँवों और आमीझणों की सेवा का कार्य हो जाता है। इस वाद से कोई भी सममदार व्यक्ति इन्कार नहीं कर सकता कि हमारे देश में गाँवों और आमीणों की सेवा फे कार्य से बढ़ कर पुए्य और घमे का दूसय कोई छाये नहीं है !

हप और सन्तोष का विपय है कि हमारे देशवासी जनता, और सरकार दोनों ही, इस काये के महत्व को सममने छगे हैं। शाही कृषि कम्रीशत ने भी गाँवों और ग्रामीणों की सेवा के शुभ कार्य पर काफो जोर दिया है। देश के लोकसेची नेता तो बहुत दिनों से इस पुण्य काये क्री ओर जनता और सरकार का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं। साथ ही अनेक सब्जनों से इस शुभ काये का श्री गणेश सी कर दिया है। इसका वर्णन यथासमय आगे आदेगा हो। अधिकारी इस काये के महत्व को सली भाँति सममते लगे हैं। पत्ाव क्षी सहयोग समि-

तिश्रों छे भूवपूर्ष रजिस्ट्रार मिस्टर सी० एफ० स्ट्रिक लैएड सी० आई० ई० ने अपनी प6घू७७ ०ऐएएशफशे४0४३०ापत- 98 90 ॥0 प8 982 नामक पुस्तक में पन्‍्द्रहवें प्र्ठ पर लिखा है कि आवश्यकता इस वात को है कि सब सरकारी सहकमों के चढ़े अफसर इस वात को सहसूस करलें कि गाँवों और आमीरों छी सेवा का काये राजविद्रोह्त्मक आन्दोलन के दमन के काम से कम महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि गांवों और आमीणों की सेवा

गाँवों और आमीणों की सेवा ३६

का काय राजविद्रोहात्मक आन्दोलन को रोकने के लिये सर्वोत्तम उपाय है। है शहरों का कत्तव्य गाँवों के प्रति शहरों के कत्तव्य की चर्चा करते हुए आचाये शिवराम एन फेरवानी ने लिखा है कि अन्याय से अन्त में पतन और सत्यु का सामना करना पड़ता है। शहरों को इस बात की , ओर ध्यान देना चाहिए! शहर को पास-पड़ोस के गाँवों से चहुत् अवलम्व मिलता है। वहीं से उसको भोजन मिलता है। इसलिए अगर शहर अपनी पेदा की हुई चीजों और अपनी संस्कृति से गाँवों को अवलम्ब नहीं देंगे। यदि वे गाँवों के प्रति अपने कर्तव्य का पालन नहीं करेंगे, और गाँवों के जीवन के ड्वास को जारी रहने देंगे, तो वे गाँवों का ऋण चुकाने के वोष के भागी होंगे, जिसके दृण्डस्वरूप स्वयं शहरो का पतन अनिवायय है। शहर अपने शरीर के किए खुराक गाँवों से ही केते हैं; परन्तु क्या वे गाँवो के लिए जरूरी औजार वना कर और उनके जीवन को उन्नत करने का प्रयत्ञ करके गाँबो के इस ऋण से उऋण होने का प्रयत्न करते हैं? शहर वाले गाँवों से जितना लाभ उठाते हैं, उसका शतांश भी लाभ उन्हे नहीं पहुँचाते। परिणाम स्वरूप देश को दुहरी हानि उठानो पड़ रही है। आचाय वात्वाती का यह कथन बिलकुल ठीक है कि नगरो को , सक्ाधिक्य का रोग है और देदातों को छुयी का। शहरों को गाँव वालों की परवाह करनी चाहिए। जब तक शहर वाले अपने बिल्ले के गाँवों के ऋण से उऋण नहीं होगे, तव॒ तक शहर का जीवन सुखमय और शान्त नहीं हो सकता। इस समय तक तो शहर वाले हरामखोरी से काम ले रहे हैं। उन्हें यह भी पता नहीं कि देहातों में भी हमारे ही जैसे मनुष्य, हमारे भाई रहते हैं और भाई मी ऐसे जो हमारे अन्नदाता है।

४० सेवाघम ओर सेवा मार्ग

नग्न तल

शहर वाले क्या कर सकते हैं

आचाये फेखानी का कहना है कि शहर वालों का कर्तव्य है कि जो लोग गाँवों से कर मजदूरी के लिए शहरों में बसते हैं, उनके लिये अच्छे घरों का प्रवन्ध करें। वन्यई का उदा- हसुण देते हुए उन्होंने दिखाया है कि वम्बई स्थूनिसिपैलिदी फे नियमानुसार शहर में घोड़ों के अस्तवल के लिए, कम-्से-कम! पिचदृत्तर फीट जगद्द, भेस के लिये साढ़े वासठ फीट और बैलों के लिए पचास फीट जगह रखना लाजिभी है, लेकिन भनुष्यों के लिए सिर्फ पच्चीस फीट जगह